ध्यान क्या है? – ओशो | What is Meditation in Hindi by Osho

ध्यान के लिए एक घंटा निकाल लेना इसलिए उपयोगी है कि आप उस समय को पूरा का पूरा ही ध्यान में नियोजित कर सकते हैं। एक दफा कला आ जाए तो उस कला का उपयोग आप चौबीस घंटे कर सकते हैं। ध्यान एक कला है। फिर आप जो भी आप करें, वह ध्यानपूर्वक कर सकते हैं। और तब अलग से ध्यान करने की कोई जरूरत नहीं रह जाती।

लेकिन जब तक वैसी घटना न घटी हो, तब तक कृष्णमूर्ति को सुनकर या किसी को भी सुनकर तरकीबें मत निकालें। हम इतने होशियार हैं तरकीबें निकालने में, कि जिससे हमारा मतलब सधता हो, वह बात हम तत्काल निकाल लेते हैं।

कृष्णमूर्ति लोगों को कहते हैं, गुरु की कोई जरूरत नहीं है। उनके पास उसी तरह के लोग इकट्ठे हो जाते हैं, जो किसी भी गुरु के सामने झुकने में अहंकार की तकलीफ पाते हैं। वे इकट्ठे हो जाते हैं। वे बड़े प्रसन्न होते हैं। वे कहते हैं, जब कृष्णमूर्ति कह रहे हैं, तो ठीक ही कह रहे हैं कि गुरु की कोई जरूरत नहीं है।

लेकिन अगर गुरु की कोई जरूरत नहीं है आपको, तो कृष्णमूर्ति के पास किसलिए जाते हैं? क्या प्रयोजन है? सिर्फ कह देने से कि गुरु की जरूरत नहीं है, कोई फर्क पड़ता है?जब तक आप किसी से सीखने जाते हैं, तब तक आपको गुरु की जरूरत है। और बड़े मजे की बात यह है कि यह बात भी आपकी बुद्धि से पैदा नहीं हुई है कि गुरु की जरूरत नहीं है। यह भी किसी दूसरे ने आपको सिखाई है! यह भी आपने गुरु से ही सीखी है!

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, कृष्णमूर्ति ऐसा कहते हैं, कृष्णमूर्ति ऐसा कहते हैं। वे कहते हैं, गुरु की कोई जरूरत नहीं है। यह भी तुम्हारी बुद्धि का मामला नहीं है, यह भी तुम किसी गुरु से सीख आए हो! इसको भी सीखने तुम्हें किसी के पास जाना पड़ा है। इस साधारण—सी बात को सीखने भी किसी के पास जाना पड़ा है कि गुरु की कोई जरूरत नहीं है। परमात्मा को सीखने तुम किसी गुरु के पास नहीं जाना चाहते हो!

अड़चन कहीं और है। गुरु की जरूरत नहीं है, इससे तुम्हारा मन प्रसन्न होता है। प्रसन्न इसलिए होता है कि चलो,अब झुकने की कोई जरूरत नहीं है, अब कहीं झुकने की कोई जरूरत नहीं है। तुमने बड़ी गलत बात निकाली। तुमने अपने मतलब की बात निकाल ली।

मेरे पास लोग आते हैं। मैं जो कहता हूं उसमें से वे वे बातें निकाल लेते हैं, जो उनके मतलब की हैं और जिनसे उनको बदलना नहीं पड़ेगा। वे मेरे पास आते हैं कि आपने बिलकुल ठीक कहा। जंगल में जाने की, पहाड़ पर जाने की क्या जरूरत है! ज्ञान तो यहीं हो सकता है। बिलकुल ठीक कहा है।

तो मैं उनको पूछता हूं यहीं हो सकता है, कब तक होगा, यह मुझे कहो। और यहीं हो सकता है, तो तुम यहीं करने के लिए क्या कर रहे हो?

उन्होंने मतलब की बात निकाल ली कि कहीं जाने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जहां तुम हो, वहां तो तुम पचास वर्ष से हो ही। अगर वहीं ज्ञान होता होता, तो कभी का हो गया होता। लेकिन तुमने अपने हिसाब की बात निकाल ली।

ध्यान कठिन है। न तो चिंतन, न मनन, न सुनना—श्रवण। इनमें कोई कठिनाई नहीं है। ध्यान बहुत कठिन है। ध्यान का अर्थ है कि कुछ घड़ी के लिए बिलकुल शून्य हो जाना। सारी व्यस्तता समाप्त हो जाए। मन कुछ भी न करता हो।

यह न करना बहुत कठिन है। क्योंकि मन कुछ न कुछ करना ही चाहता है। करना मन का स्वभाव है। और अगर आप न—करने पर जोर दें, तो मन सो जाएगा।

मन दो चीजें जानता है, या तो क्रिया और या निद्रा। आप या तो उसे काम करने दो और या फिर वह नींद में चला जाएगा। ध्यान तीसरी दशा है। क्रिया न हो और निद्रा भी न हो,तब ध्यान फलित होगा।

कठिन से कठिन जो घटना मनुष्य के जीवन में घट सकती है, वह ध्यान है। और आप कहते हैं, हम चौबीस घंटे क्यों न करें! आप मजे से करें। लेकिन घडीभर करना मुश्किल है, तो चौबीस घंटे पर आप फैलाइएगा कैसे?

एक उपाय है कि आप साक्षी— भाव रखें, तो चौबीस घंटे पर फैल सकता है। लेकिन साक्षी— भाव आसान नहीं है। और जो आदमी घडीभर ध्यान कर रहा हो, उसके लिए साक्षी— भाव भी आसान हो जाएगा। लेकिन जो आदमी घडीभर ध्यान भी न कर रहा हो, उसके लिए साक्षी— भाव भी बहुत कठिन होगा।

अति कठिन है यह खयाल करना कि मैं देखने वाला हूं। कोशिश करें! घड़ी अपने सामने रख लें। और घड़ी में जो सेकेंड का काटा है, जो चक्कर लगा रहा है, उस सेकेंड के काटे पर ध्यान करें। और इतना खयाल रखें कि मैं देखने वाला हूं सिर्फ देख रहा हूं।

आप हैरान होंगे कि पूरा एक सेकेंड भी आप यह ध्यान नहीं रख सकते। एक सेकेंड में भी कई दफा आप भूल जाएंगे और दूसरी बातें आ जाएंगी। चौबीस घंटा तो बहुत दूर है, एक सेकेंड भी पूरा का पूरा आप यह ध्यान नहीं रख सकते कि मैं सिर्फ द्रष्टा हूं। इसी बीच आप घड़ी का नाम पढ़ लेंगे। इसी बीच घड़ी में कितना बजा है, यह भी देख लेंगे। घड़ी में कितनी तारीख है, वह भी दिखाई पड़ जाएगी। इसी बीच बाहर कोई आवाज देगा, वह भी सुनाई पड़ जाएगी। टेलिफोन की घंटी बजेगी, वह भी खयाल में आ जाएगी, किसका फोन आ रहा है! अगर कुछ भी बाहर न हो, तो भीतर कुछ स्मरण आ जाएगा, कोई शब्द आ जाएगा। बहुत कुछ हो जाएगा।

एक सेकेंड भी आप सिर्फ साक्षी नहीं रह सकते। तो अपने को धोखा मत दें। घडीभर तो निकाल ही लें चौबीस घंटे में, और उसको सिर्फ ध्यान में नियोजित कर दें। ही, जब घड़ी में सध जाए वह सुगंध, तो उसे चौबीस घंटे पर फैला दें। जब घड़ी में जल जाए वह दीया, तो फिर चौबीस घंटे उसको साथ लेकर चलने लगें। फिर अलग से बैठने की जरूरत न रह जाएगी।

अलग से बैठने की जिस दिन जरूरत समाप्त हो जाती है, उसी दिन जानना कि ध्यान उपलब्ध हुआ। अलग से बैठना तो अभ्यास—काल है। वह तो प्राथमिक चरण है। वह तो सीखने का वक्त है। इसलिए ध्यान के जानकारों ने कहा है कि जब ध्यान करना व्यर्थ हो जाए, तभी समझना कि ध्यान पूरा हुआ।

लेकिन इसको पहले ही मत समझ लेना, कि जब ज्ञानी कहते हैं कि ध्यान करना व्यर्थ हो जाए, तब ध्यान पूरा हुआ, तो हम करें ही क्यों! तो आपके लिए फिर कभी भी कोई यात्रा संभव नहीं हो पाएगी।

अच्छा है अगर चौबीस घंटे पर फैलाएं। लेकिन मैं जानता हूं, वह आप कर नहीं सकते। जो आप कर सकते हैं,वह यह है कि आप थोड़ी घड़ी निकाल लें। एक कोना अलग निकाल लें जीवन का। और उसे ध्यान पर ही समर्पित कर दें। और जब आपको आ जाए कला, और आपको पकड़ आ जाए सूत्र, और आप समझ जाएं कि किस क्वालिटी, किस गुण को ध्यान कहते हैं। और फिर उस गुण को आप चौबीस घंटे याद रखने लगें, स्मरण रखने लगें, उठते—बैठते उसको सम्हालते रहें।

जैसे किसी को कोई कीमती हीरा मिल जाए। वह दिनभर सब काम करे, बार—बार खीसे में हाथ डालकर टटोल ले कि हीरा वहां है? खो तो नहीं गया! कुछ भी करे, बात करे,चीत करे, रास्ते पर चले, लेकिन ध्यान उसका हीरे में लगा रहे।

कबीर ने कहा है कि जैसे स्त्रियां नदी से पानी भरकर घड़े को सिर पर रखकर लौटती हैं, तो गाव की स्त्रियां हाथ भी नहीं लगाती, सिर पर घड़े को सम्हाल लेती हैं। गपशप करती,बात करती, गीत गाती लौट आती हैं। तो कबीर ने कहा है कि यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से वे कोई भी ध्यान घड़े को नहीं देतीं,लेकिन भीतर ध्यान घड़े पर ही लगा रहता है। गीत भी चलता है। बात भी चलती है। चर्चा भी चलती है। हंसती भी हैं। रास्ता भी पार करती हैं। लेकिन भीतर सूक्ष्म ध्यान घड़े पर लगा रहता है और घड़े को वे सम्हाले रखती हैं।

जिस दिन ऐसी कला का खयाल आ जाए, तो फिर आप कुछ भी करें, ध्यान पर आपका काम भीतर चलता रहेगा। लेकिन यह आपसे आज नहीं हो सकेगा।

कृष्णमूर्ति की बुनियादी भूल यही है कि वे आप पर बहुत भरोसा कर लेते हैं। वे सोचते हैं, आप यह आज ही कर सकेंगे। उनसे भी यह आज ही नहीं हो गया है। यह भी बहुत जन्मों की यात्रा है। और उनसे भी यह बिना गुरु के नहीं हो गया है। सच तो यह है कि इस सदी में जितने बड़े गुरु कृष्णमूर्ति को उपलब्ध हुए, किसी दूसरे व्यक्ति को उपलब्ध नहीं हुए। और गुरुओं ने जितनी मेहनत कृष्णमूर्ति के ऊपर की है, उतसई किसी शिष्य के ऊपर कभी मेहनत नहीं की गई है।

जीवन के उनके पच्चीस साल बहुत अदभुत गुरुओं के साथ, उनके सत्संग में, उनके चरणों में बैठकर बीते हैं। उनसे सब सीखा है। लेकिन यह बड़ी जटिलता की बात है कि जो व्यक्ति गुरुओं से ही सब सीखा है, वह व्यक्ति गुरुओं के इतने खिलाफ कैसे हो गया? और वह क्यों यह कहने लगा कि गुरु की कोई जरूरत नहीं है? और जिस व्यक्ति ने ध्यान की बहुत—सी प्रक्रियाएं करके ही समझ पाई है, वह क्यों कहने लगा कि ध्यान की कोई जरूरत नहीं है?

इसके पीछे बड़ी मनोवैज्ञानिक उलझन है। और वह उलझन यह है कि अगर गुरु को आपने ही चुना हो, तब तो ठीक है। लेकिन अगर गुरुओं ने आपको चुनकर आपके साथ मेहनत की हो, तो एक अंतर्विरोध पैदा हो जाता है।

कृष्णमूर्ति ने खुद नहीं चुना है। कृष्णमूर्ति को चुना गया है। और कुछ गुरुओं ने अथक मेहनत की है उनके साथ,ताकि वे ज्ञान को उपलब्ध हो जाएं।

यह बड़े मजे की बात है कि अगर आपको जबरदस्ती स्वर्ग में भी ले जाया जाए, तो आप स्वर्ग के भी खिलाफ हो जाएंगे। और अपने मन से आप नरक भी चले जाए, तो गीत गाते, सीटी बजाते जाएंगे। अपने मन से आदमी नरक भी गीत गाता जा सकता है। और जबरदस्ती स्वर्ग में भी ले जाया जाए तो वह स्वर्ग के भी खिलाफ हो जाएगा। और उन लोगों को कभी माफ न कर सकेगा, जिन्होंने जबरदस्ती स्वर्ग में धक्का दिया है।

कृष्णमूर्ति पर यह ज्ञान एक तरह की जबरदस्ती थी। यह किन्हीं और लोगों का निर्णय था। और अगर कृष्णमूर्ति अपने ही ढंग से चलते, तो उन्हें कोई तीन—चार जन्म लगते। लेकिन यह बहुत चेष्टा करके, बहुत त्वरा और तीव्रता से कुछ लोगों ने अथक मेहनत लेकर उन्हें जगाने की कोशिश की।

ठीक जैसे आप गहरी नींद में सोए हों और कोई जबरदस्ती आपको जगाने की कोशिश करे, तो आपके मन में बड़ा क्रोध आता है। और अगर कोई जबरदस्ती जगा ही दे,भला जगाने वाले की बड़ी शुभ आकांक्षा हो, भला यह हो कि मकान में आग लगी हो और आपको जगाना जरूरी हो,लेकिन फिर भी जब आप गहरी नींद में पड़े हों और कोई सुखद सपना देख रहे हों, तो जगाने वाला दुश्मन मालूम पड़ता है।

कृष्णमूर्ति को अधूरी नींद से जगा दिया गया है। और जिन लोगों ने जगाया है, उन्होंने बड़ी मेहनत की हैं। लेकिन कृष्णमूर्ति उनको अभी भी माफ नहीं कर पाए हैं। वह बात अटकी रह गई है। इसलिए चालीस साल हो गए, उनके सब गुरु मर चुके हैं, लेकिन गुरुओं की खिलाफत जारी है।

उनका अपना अनुभव यही है कि गुरुओं से बचना। इसलिए वे कहते हैं कि गुरुओं से बचना। क्योंकि उन पर जो हुआ है, वह जबरदस्ती हुआ है। ध्यान से बचना। क्योंकि कोई भी विधि कहीं कंडीशनिंग, संस्कार न बन जाए। क्योंकि उन पर तो सारी विधियों का प्रयोग किया गया है। इसलिए अब वे कहते हैं, सिर्फ समझो। लेकिन समझना भी एक विधि है। और वे कहते हैं, केवल होश को गहराओ। लेकिन होश को गहराना भी एक विधि है।

अध्यात्म के जगत में आप कुछ भी करो, विधि होगी ही। और गुरु को इनकार करो, तो भी गुरु होगा। क्योंकि अगर आप अपने ही तईं बिना गुरु और बिना विधि के उपलब्ध हो सकते हैं, तो आप हो ही गए होते।

कृष्णमूर्ति की अपनी अड़चन और तकलीफ है। और वह अड़चन और तकलीफ एक अंधेरी छाया की तरह उनको घेरे रही है। वह उनके वक्तव्य में छूटती नहीं है।

कोई पूछेगा कि अगर वे ज्ञान को उपलब्ध हो गए हैं,तो यह बात छूटती क्यों नहीं? यह भी थोड़ी—सी जटिल है बात।

अगर कोई ज्ञान को उपलब्ध हो गया है, तो वह यह क्यों नहीं देख सकता कि मेरा यह विरोध गुरुओं का, मेरी प्रतिक्रिया है! मेरे साथ गुरुओं ने जो किया है, उनको मैं अब तक माफ नहीं कर पा रहा हूं! ध्यान का और योग का मेरा विरोध मेरे ऊपर ध्यान और योग की जो प्रक्रियाएं लादी गई हैं,उनकी प्रतिक्रिया है! जो आदमी ज्ञान को उपलब्ध हो गया, वह यह क्यों नहीं देख पाता?

और मैं मानता हूं कि कृष्णमूर्ति ज्ञान को उपलब्ध हो गए हैं। इसलिए और जटिल हो जाती है बात। अगर कोई कह दे कि वे ज्ञान को उपलब्ध नहीं हुए हैं, तो कोई अड़चन नहीं है। मैं मानता हूं वे ज्ञान को उपलब्ध हैं। फिर यह प्रतिक्रिया,यह जीवनभर का विरोध छूटता क्यों नहीं है? इसका .कारण आपसे कहूं। वह समझने जैसा है।

जब भी कोई व्यक्ति ज्ञान को उपलब्ध होता है, तो ज्ञान के उपलब्ध होने का क्षण वही होता है, जहां मन समाप्त होता है, जहां मन छूट जाता है और आदमी ज्ञान को उपलब्ध हो जाता है। लेकिन ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद अगर उसे अपनी बात लोगों से कहनी हो, तो उसे उसी छूटे हुए मन का उपयोग करना पड़ता है। क्योंकि मन के बिना कोई संवाद,कोई अभिव्यक्ति नहीं हो सकती।

आपसे मैं बोल रहा हूं तो मन का मुझे उपयोग करना पड़ेगा। जब मैं चुप बैठा हूं अपने में हूं, तब मुझे मन की कोई जरूरत नहीं है। अपने स्वभाव में मुझे मन की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जब आपसे मुझे बात करनी है, तो मुझे मन का उपयोग करना पड़ेगा।

तो कृष्णमूर्ति का जिस दिन मन छूटा, उस मन की जो आखिरी विरोध की दशा थी, उस मन का जो आखिरी भाव था—गुरुओं के, विधियों के खिलाफ—वह मन के साथ पड़ा है। और जब भी कृष्णमूर्ति मन का उपयोग करके आपसे बोलते हैं, तब वही मन जो चालीस साल पहले काम के बाहर हो गया,वही काम में लाना पड़ता है। और कोई मन उनके पास है नहीं। इसलिए स्वभावत: उसी मन का वे उपयोग करते हैं। इसलिए जो वे नहीं कहना चाहें, जो उन्हें नहीं कहना चाहिए वह भी कहा जाता है। वह उस मन के साथ है।

ऐसा समझिए कि आपके पास एक पुरानी मोटर है,जिसको आपने रख दिया है। अब आप उपयोग नहीं करते हैं। आप पैदल ही चलते हैं। लेकिन चालीस साल से मोटर आपके घर में रखी है। लेकिन कभी आपको तेज चलना पड़ता है और पैदल चलने से काम नहीं आता, आप अपनी पुरानी मोटर निकाल लेते हैं। और खटर—पटर करते मुहल्ले भर के लोगों की नींद हराम करते आप अपनी गाड़ी को लेकर चल पड़ते हैं।

करीब—करीब मन जिस दिन छूटता है, उसकी जो स्थिति रहती है, जब भी उसका उपयोग करना हो, उसी स्थिति में करना पड़ेगा। उसमें फिर कोई ग्रोथ नहीं होती। वह एक पुराने यंत्र की तरफ पड़ा रह जाता है भीतर। व्यक्ति की चेतना उससे अलग हो जाती है, यंत्र की तरह मन पड़ा रह जाता है। उसी मन का उपयोग करना पडता है। वह मन वही भाषा बोलता है, जिस भाषा में समाप्त हुआ था। वह वहीं रुका हुआ है।

कृष्णमूर्ति चालीस साल से दूसरी दुनिया में हैं। लेकिन मन वहीं पड़ा हुआ है, जहां उसे छोड़ा था। वह पुरानी गाड़ी,वह फोर्ड की पुरानी कार वहीं खड़ी है। जब भी उसका उपयोग करते हैं, वह फिर ताजा हो जाता है। उसके लिए वह घटना उतनी ही ताजी है।

गुरुओं ने जबरदस्ती उन्हें धक्के देकर जगा दिया है। वह मन अब भी प्रतिरोध से भरा हुआ है। वे ध्यान के विरोध में हैं, गुरुओं के विरोध में हैं। लेकिन अगर उनकी बात को ठीक से समझें, तो वह विरोध मन का ही है, ऊपरी ही है।

अगर सच में ही कोई व्यक्ति गुरुओं के विरोध में है, तो वह किसी को शिक्षा नहीं देगा। क्योंकि शिक्षा देने का मतलब ही क्या है!

तो कृष्णमूर्ति कितना ही कहें कि मैं कोई शिक्षा नहीं दे रहा हूं लेकिन शिक्षा नहीं दे रहे हैं, तो क्या कर रहे हैं! वे कितना ही कहें कि तुम्हें कोई बात देने की मेरी इच्छा नहीं है,लेकिन चेष्टा बड़ी कर रहे हैं कि कोई बात दे दी जाए। और अगर श्रोता नहीं समझ पाते, तो बड़े नाराज हो जाते हैं। समझाने की बड़ी अथक चेष्टा है। बड़े आग्रहपूर्ण हैं, कि समझो! और कहे चले जाते हैं कि मुझे कुछ समझाना नहीं है;मुझे कुछ बताना नहीं है, मुझे कोई मार्ग नहीं देना है। लेकिन क्या? क्या कर रहे हैं फिर?

हो सकता है कि आप सोचते हों कि यही मार्ग है, कोई मार्ग न देना; यही शिक्षा है, कोई विधि न देना, यही गुरुत्व है, गुरुओं से छुड़ा देना। लेकिन यह भी सब वही का वही है। कोई फर्क नहीं है।

तो कृष्णमूर्ति की एक जटिलता है, मन उनका कुछ विरोधों से भरा पड़ा है। वह पड़ा हुआ है। और जब भी वे उसका उपयोग करते हैं, वे सारे के सारे विरोध सजग हो जाते हैं।

लेकिन आप सावधान रहना। आप अपनी फिक्र करना। आप चौबीस घंटे ध्यान कर सकते हों, तो जरूर करना। और न कर सकते हों, तो कृष्णमूर्ति कहते हैं कि घंटेभर ध्यान करने से कोई फायदा नहीं है, इसलिए घंटेभर करना रोक मत देना।

सागर मिल जाए, तो अच्छा है, ध्यान का। न मिले, तो जो छोटा सरोवर है, उसका भी उपयोग तो करना ही। जब तक सागर न मिल जाए, तब तक सरोवर का ही उपयोग करना,तब तक एक बूंद भी पानी की हाथ में हो, तो वह भी जरूरी है। वह बूंद आपको जिलाए रखेगी और सागर का स्वाद देती रहेगी, और सागर की तरफ बढ़ने में साथ, सहयोग, शक्ति देती रहेगी।

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