प्रेम और भोजन का सम्बन्ध – ओशो | osho

प्रेम और भोजन बड़े गहरे जुड़े हैं। इसीलिए तो जब तुम्हारा किसी से प्रेम होता है तो तुम उसे भोजन के लिए घर बुलाते हो। क्योंकि बिना भोजन खिलाए प्रेम का पता कैसे चलेगा। जो तुम्हें बहुत प्रेम करता है, वह तुम्हारे लिए भोजन बनाता है।

जब कोई स्त्री अपने प्रेमी के लिए भोजन बनाती है, तो सिर्फ भोजन ही नहीं होता, उसमें प्रीति भी होती है। होटल के भोजन में प्रीति तो नहीं हो सकती। तो शरीर तो तृप्त हो जाएगा, लेकिन कहीं प्राण खाली—खाली रह जाएंगे।

मां जब अपने बेटे के लिए भोजन बनाती है तो चाहे भोजन रूखा—सूखा ही हो, फिर भी उसमें एक स्वाद है। वह प्रीतिभोज है। कहीं किसी ने कितना ही अच्छा भोजन खिलाया हो, लेकिन खिलाने का मन न रहा हो, बेमन से खिलाया हो, तो पचेगा नहीं। पचा भी तो शरीर से गहरा न जाएगा।

इस देश में तो हमने हजारों साल पहले इस बात का बोध कर लिया था कि प्रेम कहीं अनिवार्यरूप से भोजन का हिस्सा है। और इसलिए जहां प्रेम न हो वहां भोजन स्वीकार न करना। अगर तुम्हारी पत्नी क्रोध में भोजन बना रही हो तो उस भोजन को स्वीकार मत करना। अगर तुम भोजन बना रहे हो क्रोध में तो मत बनाना, क्योंकि क्रोध में जब भोजन बनाया जाता है तो विषाक्त हो जाता है। आज परिणाम नहीं होगा, कल परिणाम होगा। कल नहीं होगा, परसों होगा, जहर इकट्ठा होगा।

जब तुम भोजन करने बैठो, अगर क्रोध में हो तो मत करना भोजन। क्योंकि जब तुम प्रेम से भरे होते हो, तभी बाहर से बहते प्रेम को भी तुम भीतर ले जाने में समर्थ होते हो।

प्रेम से प्रेम का तालमेल होता है, संयोग होता है। प्रेम की तरंग प्रेम की तरंग को भीतर ले जाती है। अगर तुम क्रोधित बैठे भोजन कर रहे हो तो तुम भोजन तो कर लोगे, लेकिन प्रेम की तरंग भीतर नहीं जा सकेगी। और फिर क्रोध में जो तुम भोजन करोगे वह भी विषाक्त हो जाएगा।

इसलिए इस देश में तो हमने बड़े नियम बनाए थे कि क्रोध में कोई भोजन न करे, क्रोध में बनाया भोजन न करे। किसके हाथ का बनाया भोजन करे, किसके हाथ का बनाया भोजन न करे। किस घड़ी में कोई भोजन बनाए।

इस देश में तो चार दिन के लिए स्त्रियां जब उनका मासिक-धर्म हो तो भोजन के लिए मना कर दिया था। अब संभव है कि भविष्य फिर विज्ञान के आधार से मना करे। क्योंकि जब चार दिन स्त्रियों का मासिक—धर्म होता है तो उनके शरीर में इतने रूपांतरण होते हैं,

इतना हार्मोनल अंतर होता है कि उनके भीतर सब प्रीति सुख सूख जाती है—इतनी पीड़ा होती है। उस पीड़ा और दर्द में आशा नहीं है कि उनका प्रेम बह सके, इसलिए उस घडी में भोजन बनाना ठीक नहीं है। उस घड़ी में बनाया गया भोजन विषाक्त हो जाएगा।

इस पर तो प्रयोग भी चले हैं।

इंग्लैंड की एक प्रयोगशाला डिलाबार में उन्होंने प्रयोग किए हैं। अगर जिस स्त्री को मासिक—धर्म के समय बहुत पीड़ा होती है, पेट में बहुत दर्द होता है, उस समय अगर वह गुलाब का फूल अपने हाथ में ले ले, तो दुगुनी गति से गुलाब का फूल सूख जाता है दुगुनी गति से।

वही स्त्री जब मासिक—धर्म में न हो, तब गुलाब के फूल को हाथ में लेती है, तो अगर उसको सूखने में घंटाभर लगे, मुर्झाने में घंटाभर लगे, तो मासिक—धर्म के समय आधा घंटे में मुर्झा जाता है। तो गुलाब के फूल तक पर तरंगें पहुंच जाती हैं। तो भोजन में भी तरंगें उतर जाएंगी।

यह जो हम हैं, केवल शरीर ही नहीं हैं, आत्मा भी हैं। तो आत्मा का भी कुछ भोजन होगा, जैसे शरीर का कुछ भोजन है। इसीलिए तो प्रेम के लिए इतनी लालसा होती है। आदमी भूखा रह ले, लेकिन प्रेम के बिना नहीं रहा जाता। आदमी गरीब रह ले, लेकिन प्रेम के बिना नहीं रहा जाता। बिना धन के रह ले, निर्धन रह ले, लेकिन बिना प्रेम के नहीं रहा जाता।

प्रेम की एक गहन प्यास है। वह प्यास इतना ही बता रही है कि आत्मा कहीं अतृप्त है। आत्मा को जो मिलना था, नहीं मिला, आत्मा का भोजन नहीं मिला.

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