मन को वश में कैसे करें? ओशो | How to Control Your Mind in Hindi by Osho

एक बार एक राजा ने सात जंगली घोड़े पकड़े। उसने उन्हें वर्ष भर खूब खिलाया-पिलाया और उनसे कोई काम भी नहीं लिया। वे स्वच्छंद घोड़े बहुत शक्तिशाली और खतरनाक हो गये। उन्हें अस्तबल से भी निकालना कठिन हो गया।

उनके पास जाना भी खतरे से खाली नहीं था। तब उसने राज्य में घोषणा की कि जो सात व्यक्ति उन पर सवारी करेंगे, उन्हें वह सम्मानित करेगा और अपनी सेना में उच्च पदों पर लेगा और उनमें जो प्रथम आयेगा, उसे वह अपनी घुड़सवार सेना का सेनापति बनायेगा।

बहुत लोग उन घोड़ों को देखकर ही वापिस लौट गये। पर सात बहादुर सवारों ने साहस किया। प्रतियोगिता हुई। सौ मील के गंतव्य पर उन पर सवारी करके पहुंचना था। उन घोड़ों के लिये वह काम घंटों का भी नहीं था, पर राजा ने सात दिन का समय दिया था।

उसने कहा कि सवार यदि सात दिन में भी उन घोड़ों को लेकर गंतव्य पर पहुंच सके, तो वह मानेगा कि उन्होंने घोड़ों को जीत लिया है!

नियत दिन पर घोड़े बाहर निकाले गये। हजारों लोग देखने इकट्ठे हुए थे। उन घोड़ों के बाहर निकालते ही वे सवारों को लेकर–राह छोड़कर–जंगल की ओर भागे। उन्हें वश में करना था। सवार उनके ऊपर थे, लेकिन जरा भी उनके ऊपर नहीं थे।

सवारों का उन पर कोई वश नहीं था। सवार उन्हें नहीं, वे ही उन सवारों को ले गये। सवार उन्हें नहीं ले जा सके, पर वे सवारों को लेकर हवा हो गये थे।

एक दिन बीता, दो दिन बीते, लोग चिंतित हुए। न सवारों का कोई पता था, न घोड़ों का कोई पता था। पर तीसरे दिन एक सवार लौटा–लहू-लुहान। वह भी चोट खाया हुआ, घोड़ा भी चोट खाया हुआ। फिर धीरे-धीरे सब लौटे, पर एक नहीं लौटा।

जो सबसे पहले सवार हुआ था, वह नहीं लौटा। अत्यंत टूटे हुए और क्लांत छह सवार और घोड़े सात दिन की अवधि के पूर्व ही निश्चित गंतव्य पर पहुंच गये। पर प्रथम का अंत तक कोई पता नहीं था। करीब-करीब तय ही था कि वह समाप्त हो गया है और अब नहीं लौटेगा।

पर सातवें दिन सूरज डूबने के पूर्व–समय के पूर्व ही वह भी लौटा और उसे देखकर सब चकित हो गये। वह गीत गाता लौट रहा था और उसका घोड़ा भी स्वस्थ था और प्रसन्न था और बहुत उमंग से भरा था और अपने मालिक के प्रति उसकी आंखों में कृतज्ञता और प्रेम था।

राजा ने उससे कहा : ‘तुम अकेले ही सवार मालूम होते हो, बाकी कोई भी सवार नहीं है। उन सबकी सवारी घोड़ों ने ही की है!’
उस राजा ने उसे अपना सेनापति बनाया। उसकी सवारी का रहस्य क्या था? वही रहस्य, सीक्रेट मन की सवारी का भी है।

वह सवार अदभुत था। वह चार दिन तक केवल घोड़े की पीठ का साथी रहा। उसने सवार बनने की नहीं, साथी बनने की कोशिश की।

उसने घोड़े की लगाम को छुआ भी नहीं। उसने उसे कोई दिशा नहीं दी। उसने उसे कोई इशारा तक नहीं किया। वह उसके ऊपर था पर बिल्कुल अनुपस्थित था। उसने उसे पता भी नहीं चलने दिया कि वह है।

घोड़ा स्वच्छंद था, घोड़ा मुक्त था और सवार केवल दर्शक था। घोड़ा जब थक जाता, वह उसे विश्राम देता, उसके लिये भोजन और छाया की व्यवस्था करता। वह जब फिर भागने को उत्सुक होता, वह चुपचाप उसकी पीठ पर हो जाता, लेकिन ऐसे जैसे कि कोई पीठ पर नहीं है–सवार नहीं, मात्र दर्शक।

और यह रहस्य, सीक्रेट था। घोड़ा चार दिन में मित्र हो गया, विनीत हो गया। प्रेम से जीत हो गई थी और पराया अपना हो गया था। वह शत्रु नहीं रहा, मित्र हो गया। शत्रु को अस्वीकार किया जा सकता है, मित्र को अस्वीकार करना मुश्किल था। फिर सवार ने उसे जहां चाहा वह वहीं आ गया था।

मनुष्य को–इसके पहले कि वह अपने को जीते और जाने–अपनी सारी अंतर्निहित शक्तियों से मैत्री करनी होती है। उन्हें जानना और उनसे परिचित होना होता है। उनसे संघर्ष नहीं, सहयोग को निर्मित करना होता है।

एक शब्द में, उसे अपने से प्रेम करना होता है। हम अपने से भी प्रेम नहीं करते हैं। तो हम किसी दूसरे को क्या प्रेम करेंगे? अपने प्रति प्रेम का रुख अपनायें। अपने शरीर और मन दोनों के प्रति प्रेम की भावना करें।

वे आपके जीवन के उपकरण हैं। आपकी आत्मा के मंदिर हैं। सहानुभूति और प्रेम के प्रकाश में ही वे अपने रहस्य खोलते हैं और आपको उनमें प्रवेश मिलता है।

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